बागी.

बागी (लघुकथा)

प्रिसींपल साहेब सख्त मिजाज के हैं, स्कूल का अनुशासन बिगड़ जाऐ ये उन्हे कतई मंजूर नही, अगर ऐसा हो जाऐ तो समझो स्कूल के स्टाफ और शिक्षको की खैर नहीं, इस सख्ती के साथ उनमें प्रिसींपल होने का गरूर भी शामिल है, कई बार स्टाफ और शिक्षको के साथ उन का बर्ताव आमतौर पर नौकर मालिक जैसा भी होता है, स्टाफ और शिक्षकों की मजाल नहीं कि उनके सामने चूं भी कर जाएं .
कल हिंदी वाली सुधा मैडम पेपर चेक करने के लिए स्टाफ रूम में क्या गई कि दसवीं कक्षा के पांच लड़के दीवार फांदकर स्कूल से भाग गए. प्रिंसिपल सर को इसका जैसे ही पता लगा वह गुस्से से आग बबूला हो गए. अगले दिन सुबह प्रार्थना के वक्त उन्होंने उन लड़कों को एक लाइन में खड़ा कर दिया और साथ में दूसरी तरफ सुधा मैडम को बुलाकर उन्हें डांटना शुरू कर दिया इतने में रश्मि जो स्कूल में नई नई टीचर लगी थी उसने प्रिंसिपल से आपसे मुखातिब होकर कहा, “यह क्या तरीका है सर आपका, किसी टीचर से बात करने का?”.
“आप से बात नहीं हो रही रश्मि जी आप चुप रहिए”. प्रिंसिपल सर ने सख्त लहजे में कहा.
“नहीं सर, मैं चुप क्यों रहूं, आज आप मुझसे यह बात नहीं कर रहे है,लेकिन कल को मेरे से भी आप इसी तरह से बात करेंगे, अगर आप बच्चों के सामने टीचर से इस तरह बात करेंगे तो टीचर की क्या इज्जत करेंगे बच्चे, यह कोई तरीका नहीं है, टीचर और प्रिसींपल के बीच बात आफिस में ही होनी चाहिऐ”, बेधड़क रश्मि बोल उठी.
प्रिंसिपल साहब को सहसा यकीन नहीं हुआ कि यह क्या हो रहा है और बेहद तिलमिलाए से सब बच्चों को अपनी अपनी क्लास में जाने का कह कर अपने ऑफिस की तरफ तेज कदमों से चले गए. सारा स्टाफ हैरानी से रश्मि की तरफ देख रहा था और सुधा मैंम सोच रही थी कि नई पीढ़ी जानती है सही गलत के लिए बोलना…

© हरदीप सबरवाल.

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very well written @Hardeep_sabharwal Ji and welcome back to YoAlfaaz :slight_smile:

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