||सफ़र ||

ज़िन्दगी में नाजाने कितने सफ़र किए
मगर ये सफ़र सुहाना है
मरने की सोचते रहे ज़िन्दगी भर
अब जीने की आस को पाना है
सबके सिर के भोज उठाए फिरते थे
अब ख़ुद का भोज किसी अपनो के सिर कर जाना हैं

ज़िन्दगी में ना जाने कितने सफ़र किए
मगर ये सफ़र सुहाना है
मुँह फुलाए एक दूजे के घर जाते थे
बच्चें हीं थे ना अब बड़ों के फ़र्ज़ निभाना है
खेल कूद कर जिंदगिया बितायी थी
अब किसी अपनो को खेलाते जाना है

ज़िन्दगी में ना जाने कितने सफ़र किए
मगर ये सफ़र सुहाना हैं
लाल बती के गाड़ी में बेठने का शोक था
अब शोक लाल बती में पूरा करके जाना हैं
भीड़ से निकले हम अब भीड़ को दिखाना हैं
दो हाथ थाम चले हम,अब चार कंधो में जाना हैं

ज़िन्दगी में ना जाने कितने सफ़र किए
मगर यें सफ़र सुहाना हैं
ख़ुद पे हँसते हुए नजाने कितनो को देखा
अब बिन देखे उनको भी रुलाना हैं
प्यार की रोटी खाई अब ख़ुद प्यार से बनाना हैं
जो भूखें होगे उनका दुःख में पेट भर जाना है

ज़िन्दगी में ना जाने कितने सफ़र किए
मगर ये सफ़र सुहाना हैं

Crooked_dimple
Aditi

4 Likes

well written… keep it up…

1 Like

Well @Crookeddimple this is really so nice
ek to tittle ka post me istemaal gazab hai or har antre me alag hi maza hai

ye lines sabse jyada mazedaar or dil choone wali thi
keep writing my friend

2 Likes

Thnkusomuch ma’am❤️

1 Like

very well penned…