उनकी हूं मैं ,और मेरे हैं वो

उलझी डोर हूं मैं
जिसे सुलझाते है वो

कभी सम्हलती नहीं मैं
पर सम्हालते है वो

थोड़ी गर्म मिज़ाजी हूं मैं
लेकिन शीतल है वो

गर जिस्म हूं मैं
तो मेरी रूह है वो

फरेब हूं मैं इश्क़ में
लेकिन आदिल है वो

और हूं कड़वी नीम मैं
तो मीठी चासनी है वो

गर तीखी जवान हूं मैं
तो कोमल बोल है वो

मैं हूं आफ़ताब उनका
तो दीद -ए- नूर है वो

पेड़ की टहनी हूं मैं
तो उसपे बैठा मोर है वो

और घर का आंगन हूं मैं
तो उस आंगन की हरियाली है वो

मैं हूं नज़र उनकी
तो नज़रों की तहरीर है वो

गर हूं मैं मामूली हर्फ़
तो हर्फ़-ए -इनायत है वो

और हूं मैं शायर
तो मेरी शायरी के जज़्बात है वो

गर ज़िन्दगी की सांझ हूं मैं
तो मेरी जिंदगी का हर पहर है वो

माना हूं फ़ज़ल मैं उनकी
तो ग़ज़ल-ए-महफ़िल है वो

और मैं हयात हूं उनकी
तो रंग -ए- तमाज़त है वो

(रंग -ए- तमाज़त- colour of heart)
:writing_hand:Manu jain

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Beautiful. :heart:

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:blush:

This is wow manu… Great … :slightly_smiling_face:

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Behad khoob, Mohatrma :two_hearts::heart:

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Thank you :blush:

Shukriya :pray: