तसव्वुर/कल्पना ।

तसव्वुर में ही सारी दुनिया समाई है ,
वरना महज़ एक माटी के पुतले को अशरफ़ -उल - मख़लूक़ात का दर्जा कहाँ मिलता ।
यही वह कल्पनाशक्ति है जो एक मामूली सी मिटी को भी ,
शिल्प के नायाब अजूबों मे तब्दील कर देती है ।
यही वह तसव्वुर है ,जो आशिक़ को ईश्क़ के एहसास को पाने हेतु चिंताग्रस्त कर देता है ,
और यही वह तसव्वुर है ,जो शराबी को शरसार कर देता है ।
यही वो राज़ है जो बरसों से तेजस्वी ज्ञान के आविर्भाव का स्रोत बन समय रुपी सुदर्शन चक्र को चला रहा है ।
यही तसव्वुर उन कहानी,काव्य,इतिहास-पुराण,वेद, वेदांत,उपनिशद, भाष्य,वंशावली,क़ुरान, हदीस,गीता,बाइबिल,तोरा ,कथाएं,गद्य,पद्य,यात्रावृत,नाटक आदि साहित्य के अनेको रूपों मे समाज को गढ़ने और पतन से बचाने के लिए साहित्यिक हुंकार बन सामने आया है। ऐसे बहुत कम मनुष्य हैं जो कल्पना से अलग होकर ,स्वतंत्र विचार निकाल पाएं ।
तसव्वुर कहो या कल्पना , मानवीय चितन का मूल आधार है । ये वह प्रदीप है ,जो आम इंसान को चिंता करने पर विवश कर देता है और उसे इंद्रियों द्वारा संचारित करता है । सोच कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती ,उसका स्रोत हमारे इर्द गिर्द होने वाले चीज़ों का चित्रण है । चाहे आप किसी संत का उदाहरण लीजिए या किसी नशे में चूर शराबी का या किसी माशूका के प्रेम मे पागल आशिक़ का , या किसी विद्यमान व्यक्तिविशेष का ,हर किसी की अपनी - अपनी कल्पना है हर किसी की अपनी अपनी अनुभूति है । बिना तस्सवुर के एक शब्द भी नहीं था , बिना तस्सवुर के " मै " भी नहीं था , बिना तस्सवुर के ज्ञान ,कर्म,उपासना, संसार के जितने भी मख्लूक़ हैं वो सब कलपना के अंदर हैं । कलपना से बाहर क्या है जो जान गया , वही मूल तत्व , सत्य/या हक़ीक़त से रूबरू हो सकता है । तवक़्क़ुल भी वही है जो तसव्वुर से परे सोचने वाले जानते हैं ।

                      - शाहीर रफ़ी
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bohot khoob likha hai janab… sabdo ka bohot accha istemal kiya hai…

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