वेश्यावृत्ति(जिस्मफरोशी) ,एक सामाजिक रूढ़ि ।

यह नज़्म उन मजबूर वर्ग की नारी सामाज पर है ,जिसे वैशिया वृत्ति जैसे अमानवीय सोशन का शिकार होना पड़ता है । इस कविता मे समाज के गिरगिट प्रकृति पर कटु व्यंग किया गया है ।

नज़्म :

नास्तिक भी तेरे मंदिर मे जाने लगे हैं ,
अंधे भी आज - कल रास्ता दिखाने लगे हैं ।
क्या जादू किया है तेरी कस्मिन जवानी ने ,
के बूढ़े भी अब शौक से इतराने लगे हैं ।

जो थे कल तक शराफ़त के प्रतीक ,
आज वह भी नज़रे चुराने लगे हैं ।
तेरी आमद की ख़ुशी मे ,ऐ गुलबदन ,
बदनाम भी नाम कमाने लगे हैं ।

जाती है जहाँ तू, ऐ रहबर -ए-ख़ामोश ,
चश्मो के काफ़िले वहाँ जाने लगे हैं ।
संगेमर्मर से तेरे प्रतिबिम्ब को तराश कर,
शिल्पकार तेरी मुरत बनाने लगे हैं ।

जो थे कुछ उखड़े - उखड़े से ,
आज ईश्क़ के फलसफे सुनाने लगे हैं ।
तुझसे रिश्ते बनाने के लिए ,
आज शादीशुदा भी आने लगे हैं ।

क्या देखा तेरे पाक दामन को किसीने ,
या ऐसे ही इल्ज़ामात लगाने लगे हैं ।
यह वही शरीफ बाबु है ना ,
जो बदनाम गलियों मे मंडराने लगे है ।

बेच दिया जब तुझको इन्होंने ,
सर ए आम हुस्न के बाज़ार मे ।
तो क्यूँ कफ़न चढ़ाने आयें हैं ,
एक व्यसिया के मज़ार मे ।

कहता है अगर बद ज़माना तुझे ,
पहले समझाए एक बात मुझे ,
किसीके चरित्र पर दाग लगाने से पहले ,
खुदको गर बे - दाग तो बनाओ ।
ख़ामी तुमारी नज़र मे है ,
कपडों पे इलज़ाम न लगाओ ।
एक मज़लूम को ज़लील करके यह,
खुदको संस्कारों मे छुपाने लगे हैं ।
इस तरह वह दुनिया को ,
अपना नक़ली चेहरा दिखाने लगे है ।
एक बदनसीब औरत को ,
बदकिरदार न कहो ।
यही तो तुम्हे हम ,समझाने लगे हैं ।
यही तो तुम्हे हम ,समझाने लगे हैं ।

#मशाहीर ए अदब

   - शाहीर रफ़ी
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kabhi kabhi to dost tum hontho ko sil dete ho,
kya khoob likhte ho
bilkul dhamaal @Shaheer_Rafi

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