मोहब्बत और क़ानून

तुम अपनी अमानत की ज़मानत करवा जाओ

मेरी हर एक जुर्म की किताब तुम जला जाओ

लोग कहते है की क़ातिल हु मैं

तुम इस क़ातिल को अपने कटघरे में खड़ा कर जाओ

तारीक मुझे भी देते जाओ

जुर्म का हर एक हिसाब तुम मुझसे लेते जाओ

मै भी जुर्म क़ुबूल कर जाऊँगी

हाँ!!इश्क़ किया है मैने

तुम्हारे हर एक धाराओ को मैं

ख़ुशी-ख़ुशी अपनाऊँगी

जो सज़ा दी मौत की तुमने

तो फाँसी के फ़ँदो को में माला समझ तुम्हारे नाम की ख़ुद पहन जाऊँगी

सच्ची थी मोहब्बत मेरी

बिना कुछ किए में दुनिया को बता जाऊँगी

तुम सज़ा तो दो मुझे मेरे हिस्से का

मैं उस सज़ा को तुम्हारी “हाँ” समझ जाऊँगी

जो तुम देखोगे मुझे तोड़ पेन की निब

तो मैं हँसते हुए तुम्हें दुआ दे जाऊँगी

इश्क़ करती हु मैं तुमसे

और तुम्हारी आशिक़ी बन जग-मगा जाऊँगी

3 Likes

Behad khoob… :blossom::heavy_heart_exclamation:

1 Like