" अधूरा सा हूँ मैं .….।

अधूरा सा हूँ मैं…,
क्योंकि अधूरा ही मंजूर है शायद क़िस्मत को ।या फिर यही किरदार है मेरा ,के दोषयुक्त रहूं हर एक क्षेत्र मे ।
नकारात्मक सोचना नहीं चाहता हूँ ,
लेकिन अपने अधूरेपन को व्यक्त करना भी ज़रूरी है ।
अपूर्ण,परिपक्व,निष्फल,अपर्याप्त,खंडयुक्त,न्यून,अयोग्य न जाने कितने पर्यायवाची शब्दों से मुझे यह समाज संबोधित करता रहा है ।
मना मै चाँद नहीं ,न ही उसके जैसा रोशन हूँ ।
लेकिन मै एक जुगनू ही सही,जो अपने लघु ज्योत से कम से कम एक छोटे से क्षेत्र को ही प्रज्वल्लित करता है ।मै विराट तो नहीं परंतु अपने ही आप मै पर्याप्त हूँ । लेकिन समाज की नज़र हमेशा उन्ही चीज़ों पर पड़ती है जिनकी चमक आँखों को चकाचौंध करने वाली हो ,नाकि दिल को चकाचौंध करने वाली ।लेकिन चांदी जैसी चमकदार चीज़ भी एक न एक दिन काली पड़ ही जाता है । तो जो अपूर्ण हैं,जिनमे पूर्णता: रुपी चमक की कमी है ,उन्हें व्यर्थ न समझें । अपितु अपूर्ण लोगों को चमकदार लोग अवसर प्रदान कीजिए और अपने ही भांति उन्हें चमकदार बनाइए ।
इन्ही बातों से दिल को तसल्ली तो मिल जाती है । जब टूट सा जाता हूँ ,तो YouTube पे संदीप माहेश्वरी या किसी और प्रवक्ता का भाषण सुन लेता हूँ और फिर प्रोत्साहित तो ज़रूर हो जाता हूँ ,परंतु जब internet की दुनिया से बाहर आता हूँ ,फिर मेरे अपूर्ण होने की सच्ची तस्वीर सामने खड़ी होती है । मुझे झूठे दिलासे और सहानुभूति पसंद नहीं ,लेकिन क्या करें कभी - कभी इस अधूरेपन को छुपाने के लिए ,उसी का सहारा लेना पड़ता है ।मुझे हमेशा से इसी बात का दुःख रहा कि मैंने कोई भी चीज़ ठीक ढंग से नहीं किया ।अगर perfectionist की भाषा मे कहें तो " Arbitrary learner" । मैंने हर चीज़ पर रूचि ज़रूर दिखाई परंतु हमेशा से एक गुरु के मार्गदर्शन से वंचित रहा उसी प्रकार जिस प्रकार महाभारत मे एकलव्य ने बिन गुरु के ज्ञान प्राप्त किया था। कभी कभी इस अधूरेपन को महफ़िल मे बयाँ करने से डर लगता है। " duffer",“Dumb”,बेवक़ूफ़,मूर्ख, गधा,"तेरा कोई aim नहीं है ","तेरा future अंधकार मे डूबा है " ऐसे ऐसे वाणी के ब्रह्मास्त्र चलाए जाते थे मुझपर ,ताकि मे अपना मनोबल तोड़ दूँ और अपने आपको एक “Failure” घोसित कर दूँ । मे अपने खामियों को चोर समझ उन्हें छुपा कर रखता था आज खुले आम अपने चोर को आप के समक्ष रख रहा हूँ । माना मेरे अंदर वह तेजस्वी,ज्ञानी,चिरंजीवी,dashing, smart, intelligent ऐसे अमूल्य तत्व नहीं हैं लेकिन एक चीज़ ज़रूर है वह है सिखने की लालसा । लेकिन जिसे हम अंग्रेजी में sycophancy कहते हैं ,उसकी आड़ मे एक भावनात्मक मन का समझ सोषण करता है । एक बच्चे को बिना उसकी मर्ज़ी जाने , उसको उसके रूचि के विपरीत काम करने पर पहले विवश करता है और असफल होने पर उसे तंज किया जाता है । शारीरिक शोषण उतना खतरनाक नहीं होता जितना की मानसिक शोषण। “Depression” क्या है उन बच्चो से जा के पूछो जिन्हें हमेशा औरों से कम समझा जाता है । खामियां उनमे नहीं समाज के भोग - विलासी चश्मे मे है । “Judgemental society”,“superiority - inferiority complex” आदि मनोविज्ञान के कईं ऐसे पहलु हैं जो ये दर्शाते हैं कि ज़्यादातर Depression ,किसी व्यक्ति को असक्षम होने पर ताना मारने से होता है । ये सब शाखा - प्रतिशाखा, मेरे अधूरेपन के साक्षी हैं । और आज मुझे अपने अधूरेपन पर गर्भ है । मे अपूंर्ण ही हूँ ,इसीलिए पूर्णता की तलाश निरंतर करता रहता हूँ । हाँ , अधूरा सा हूँ मै ।

  • शाहीर रफ़ी
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Adhoore se tum, aasmaan me Zoro ki Dhoop
Lafzo me tumahre, Anand hai bahut khoob

Nice post brother

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You have penned down your emotions in a very good way. keep going … Claps for you…

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