आज हाथ हथेली में रखकर समंदर पार कर आते है


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उस गली का मै;
कोई अनजान सफर नहीं,
तेरी मुद्दतों का ऐतबार हूं मै।

तेरे ख्यालों से
जो हर दफा गुजरता हूं,
वो ज़िदंगी का इक
बंजारा ख्वाब हूं मै।

ना शिकायत करोगी मुझसे,
वो आदत नहीं तेरी।
तू बिन कहे समझता हूं तुझे,
ऐसी रिवायत हूं मै।

तुम्हारे घर के आंगन में
हर रोज मुलाकात होती है।
तुम गले लगाती हो हमें;
और फिर तुम्हें याद करता हूं मै।

मेरी ज़िन्दगी का सफर
जो तुम्हारे साथ बिता रहा हूं,
हर महफ़िल में तुम नज़्म;
और शायरी का अंदाज़ हूं में।

यह मेरी कलम को सुनकर
तुम मुस्कुराना मत;

मुझे यादों में खीचकर ,
गले लगाना मत;
बस…
आज हाथ हथेली में रखकर
समंदर पार कर आते है…
क्योंकि ज़िदंगी की महफ़िल में,
तुम रातों का चांद और दिन का आफताब हूं मैं।

-jeet

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Beautifully penned! :heart:

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Lovely composition :heartbeat:

Thank you

Thnks a lot @Wordsbyritti

You’re A Joy!

You’re #1!