सर्द ठंड और अकेलापन।

जाड़े के दिन आए,
ठंडी हवाएं झुरझुरी पैदा कर जांए,
निग कैसे आए,
बस उसकी याद सताए,
अकेलापन नहीं कट पाए।
अगर वो होती साथ,
कभी लाती चाए का प्याला,
कभी पकोड़ों की सौगात,
दोनों खाते साथ साथ,
मिल बैठ के रजाई में पास पास।
हल्का सा मधुर संगीत बजता,
दोनों में प्यार के लिए जोश बढ़ता,
पुराने किस्से आते याद,
डुबे रहते इसी खूबसूरत लम्हें में दिन-रात।
कैसे इस अकेलेपन से पांए निजाद,
काश कोई नगीना हमारे भी आए साथ,
हमारी महौबत भी चढ़े परवान,
न जाने उपर वाला कब हो मेहरबान।
लेकिन उपर वाला भी है गलतफहमी में,
उसका पाला पड़ा है ढीठ प्रेमी से,
वो जितना चाहे करें सितम,
एक दिन हम भी बदलेंगे एक से दो में।

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शुक्रिया।

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