मंमज़ियाँ

मुझ में ख़ुशबू बसी उसी की है, जैसे ये ज़िंदगी उसी की है।
वो कहीं आस-पास है मौजूद, हू-ब-हू ये हँसी उसी की है।
मैं ख़ुद ही अपना दुखा रहा हूँ दिल, इसमें ही लेकिन ख़ुशी उसी की है।
कोई कमी नहीं मुझ में,यानी मुझ में कमी उसी की है।
क्या मेरे ख़्वाब भी नहीं मेरे,क्या मेरी नींद भी उसी की है ।

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ख़ूबसूरत :heart_eyes::yellow_heart:

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