दोगली बातें।

सब करते बातें,
साक्षर राष्ट्र बनाने की,
शिक्षा में सुधार लाने की,
सबको एक जैसी शिक्षा देने की।
परंतु क्या कोई करता प्रयत्न,
गंभीर होकर,
जब कभी छात्र छात्राओं की बात आती,
सुचि आश्वासनों से भर जाती,
कोई नहीं करता इनपे अमल,
आखिर ये बेचारे निकलते सड़कों पर,
स्कूल कालेज युनिवर्सिटीज बंद हो जाते,
अराजकता का‌ माहोल बन जाता,
सब मिठी मिठी बातें करते,
किंतु मुद्दे टस से‌ मस नहीं होते।
हुक्मरानों से कोई पूछे,
अगर फीस कर दोगे इतनी,
तो गरीब इंसान कैसे अपनी शिक्षा करेगा पुरी,
कैसे होगा राष्ट्र,
पुरी तरह साक्षर,
अंत में होगा ऐसे,
अगर पैसे हैं जेब में,
तो ही शिक्षा ले पाएंगे।
अगर हुक्मरानों की आए अपनी बारी,
तो रख देंगे सब असूल ताकपर,
जब चाहे बढ़ाएंगे अपने वेतन,
विपक्ष और सत्तापक्ष मिलकर,
नहीं होगा डिवेट तक,
दो मिनट में कर देंगें पास,
और बन जाएंगे,
करोड़ों के हकदार।
क्यों नहीं छात्र छात्राओं का भी सोचते,
और शिक्षा को सस्ता करते,
अफसोस!
सारा राष्ट्र ख़ामोश,
मीडिया ने भी साधी चुप्पी,
अब क्यों नहीं डिवेट होती।

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बेहद सुंदर रचना।
एक सच का आईना। :heart_eyes:

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शुक्रिया

BAHUT KHOOB

शुक्रिया

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