दिवाली क्या सबको भाई।

त्योहारों का वक्त आया,
मौसम भी सुहाना हो गया,
धूप भी मीठी लगने लगी,
हवा भी मध्म चलने लगी,
फल, फूल भी खिलने लगे,
सब घरों को लौटने लगे।
इसी तरह दिवाली आई,
बाज़ारों में रौनक छाई,
चहल पहल फिर से आई,
लोगों ने खूब की खरीदारी,
दूकानदारी मंदी से बाहर आई,
हर किसी ने राहत मनाई।
कुछ लोगों के दिलों में अब भी उदासी,
पैसे की किल्लत खलती,
कुछ के पास नहीं है रोज़गार,
बेचारा कैसे चलाएं घर-परिवार,
दो जून की रोटी से भी मोहताज,
फिर कैसे मनाए दिन त्यौहार।
व्यापारी पैसा नहीं लगाता,
मांग नहीं है बताता,
सरकारें ख़ामोश,
मालूम नहीं क्या दोष,
हर कोई अपना अपना समाधान बताता,
नज़दीक कुछ नहीं होता दिखता।
मेरी सरकारों से एक इंतजाह,
क्यों नहीं अपने ढ़ंग से कुछ करते,
क्यों विदेशी अर्थशास्त्रीयों के पीछे भागते,
ये है हमारी समस्या,
हमें ही करना होगा उपचार,
गरीब अमीर में है अंसतुलन,
पहले करो उसको ठीक,
70% लोग जीते एक डालर प्रतिदिन पर,
फिर कहां से आएगी शक्ति आर्थिक गतिविधि पर,
पहले लोगों के हाथ में कुछ दो,
फिर बाजार में आ पाएंगे वो,
धड़ाधड़ बीकेगा माल,
सब होंगे आबाद,
बाजार में बढ़ेगी मांग।

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