नोबेल आया, अभिजीत छाया।

भारत दुनिया में दुसरे नंबर पे आबाद,
अर्थव्यवस्था सबसे गतिशील,
प्रोफैशनलज़ सबसे अधिक निकालता,
फिर भी प्रतिष्ठा की दौड़ में पीछे रह जाता,
ऐसा हाल क्यों है,
कोई नहीं समझाता,
बस आंकड़े देके पीछा छुड़ाता,
अब इनसे भी विश्वास है उठता,
क्योंकि हकीकत और कहने में फर्क दिखता।
हालत है ये,
कोई भी संस्थान नहीं पहले 50 में,
भुखमरी सबसे अधिक,
अशिक्षित हैं असिमीत,
खेलों में फिसड्डी,
ओलिंपिक में एक-दो मैडल से नाक बची,
बस क्रिकेट ने है थोड़ा संभाला,
परंतु इस खेल का 10-12देशों में है बोलबाला,
न कोई बहुत बड़ी विज्ञानिक उपलब्धी,
ये हमने बनाई कैसी शिक्षा पद्धति,
बार-बार शोर मचता,
नई शिक्षा नीति का हल्ला गुल्ला मचता,
आखिर सब अपना मकसद हांकते,
और शिक्षा में अधिक कुछ नहीं बदलता,
जब कोई बाहर से कंपनी प्लांट लगाती,
तो हमारे लोगों को इतना सक्षम नहीं पाती,
जब कभी बज़ट की बात आती,
तो हमारी शिक्षा किसी को नहीं भाती,
सबसे कम पैसा पाती,
जबकि सबको मालूम,
कि अगर देश को सर्वोतम ताकत बनना,
तो शिक्षा का स्तर ऊंचा पड़ेगा उठाना,
जिससे हमारे स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय भी हो सक्षम,
और इनसे निकले विद्यार्थी सारी दुनिया में लहराएं पर्चम।
मुझे लगता हमारे फैसले लेने वाले ये सब नहीं चाहते,
क्योंकि उनके बच्चे इन संस्थानों में कभी नहीं आते,
उनके पास हैं बेशुमार साधन,
और वो जाते दुनिया में वहां,
जहां सबसे अच्छे संसाधन पाते।
चलो फिर भी करें गर्व,
हमारे भारतीय को मिला नोबेल पुरस्कार,
परंतु उसने भी कमाया नाम,
अमरीका में जाकर श्रीमान,
माने तब जब यहीं से कोई पाए ये पुरस्कार,
हमें भी दिलाए आत्मविश्वास।
फिर भी मैं हैरान,
किसी ने नहीं की भारत रत्न की सिफारिश,
अगर मैरिट को भी नहीं करोगे पुरस्कृत,
तो फिर कैसे संभालोगे अपनी धरोहर।

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Bohot khoob Likha hai… :slight_smile:

शुक्रिया।

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