असहाय इंसान।

ये कैसा देश,
इतना भ्रष्टाचार,
अपना पैसा,
कोई बैंक में रखता,
बुरा वक्त आने पे निकालता,
फिर उसका उपयोग करता।
लेकिन ये मेरे देश में हुआ,
कोई अपना पैसा भी नहीं ले सका,
बैंक ने दे दिया ज़बाब,
लोग आ गये भुखमरी की कगार,
कुछ को चाहिए थी दवाई,
किंतु पैसे के अभाव में,
नसीव न हो पाई,
आखिर मौत आई।
कहते! बैंक हो गया दिवालिया,
मैनेजमेंट ने खा लिया,
इतना कर्ज दे दिया,
बैंक की संपति से अधिक हो गया,
क्या कर रहा था आरवीआई,
कैसा प्रशासक है तूं भाई,
अगर तुझे ये भी नहीं मालूम होता,
कौन सा बैंक क्या करता,
हमने पढ़ा था,
हर बैंक की सिक्योरिटी होती आरवीआई के पास,
इसीलिए बैंक में पैसा रखना सुरक्षित है आज,
किंतु जो सब‌ हुआ,
उसमें आरवीआई भी कटघरे में हुआ खड़ा,
क्यों नहीं डिफाल्टर की संपति बेचते,
और साधारण लोगों के पैसे चूकाते,
शायद अब इतना बैंकिंग पे हो गया अविश्वास,
अगली पैसा जमा कराने से पहले 100बार सोचेगा हर इंसान।
सबसे बड़ी हैरानी,
हमारे राजनितीज्ञों की खामोशी,
विपक्ष और सता दोनों चुप,
अपनी अपनी राजनीति में मस्त,
कहते! चुनाव है,
आचार-संहिता लगी है,
हमारी बेबसी है,
मानो अगर अभाग्य से देश पे आक्रमण हो जाए,
तब नहीं करोगे कोई उपाय,
बोलोगे! आचार-संहिता लगी है,
हमारी बेबसी है,
ये कैसी आचार-संहिता,
हमारे नागरिक की परेशानी,
करती है उसमें इजाफा,
हमें नहीं चाहिए ऐसी आचार-संहिता,
जो करें नागरिकों को परेशान,
और पहूंचाए मौत के द्वार।
खेद! हमारे राजनितीज्ञ हैं इतने असंवेदनशील,
अगर अपने पैसे हो बढ़ाने,
दोनों सता और विपक्ष,
हो जाते सयाने,
किंतु साधारण नागरिक की है बात,
बेचारे को सुली चढ़ जाने दो आज।
उच्चतम न्यायालय भी ख़ामोश,
ले सकता था सुओमोटो एक्शन,
किंतु उसने भी नहीं सुनी बात,
भेज दिया उच्च न्यायालय के पास।
माने तब,
अगर कोई आगे आए,
और इन नागरिकों के लिए कुछ करके दिखाए,
और हमेशा के लिए उदाहरण बन जाए।

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Awesome brother @Anil_Jaswal :ok_hand::ok_hand::ok_hand:

Thanks

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Excellent

Thanks.