प्यार की कमीज़

कतरा कतरा बूँद बूँद

मैं उसको जी रहा हूँ

कुछ कतरन पड़ी है उम्मीदों की

उससे ये ख्वाब सी रहा हूँ |

वो नहीं है पास में

उसकी याद तो है

मेरे होंठों पे उसके होठों का

मीठा मीठा स्वाद तो है |

पल जो बिताये साथ में

वो अभी तक ज़हन में जिंदा है

उड़ना चाहता है उड़ नहीं पाता

दिल का ये जो परिंदा है |

वो बगीचे की घास

वो चिड़ियों की चहचहाहट

मेरे हाथ का उसके हाथ को छूना

और वो पत्तों की सरसराहट |

उसका वो पास आना

दिल की धड़कन बढाता था

रह जाता था स्तब्ध

मैं कुछ भी न कर पाता था |

गर कुछ कर पाता

तो उस लम्हे को फिर से जीता

उन बची हुई यादों की कतरन से

मैं प्यार की कमीज़ फिर से सीता |

©KK©

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