समाज के दोहरे मापदंड।

ये कैसा समाज,
जो काटने दौड़े आज,
अगर कोई रसूखदार,
हर कोई उसका चाहवान,
करे उसकी खुशामद,
बजाए जी हजूरी,
नाचे सबकुछ उसके आगे पीछे,
उसकी हजारों गलतियां भी नजरंदाज,
बस हर तरफ उसके नाम की जिंदाबाद।
और अगर कोई गरीब,
अगर कोई असहाय,
उसको हर तरफ लेने के पड़ जाएं देने,
चाहे वो जितना भी करे प्रयत्न,
उसका नहीं बनता कोई हमदर्द,
सब उसको भला बूरा कहते,
बस दिन-रात उसके पीछे पड़े रहते,
चाहे वो करता हो सबकुछ सही,
फिर भी उसकी कोई सुनवाई नहीं।
आओ सब मिलकर आगे आएं,
एक नया समाज बसाएं,
जिसमें न कोई हो बड़ा या छोटा,
हर किसी को मिले न्याय,
सब मिल जुलकर रह पाएं,
न कोई कर पाए किसी का तिरस्कार,
बस सही और ठीक की ही हो जय-जय कार।
क्या कभी ऐसा होगा,
नहीं हूं न उम्मीद,
वक्त पे है भरोसा,
उसने अच्छे अच्छों को पेला,
सबको सिखाया सबक,
तभी जीवन चल पाया आजतक।

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शुक्रिया शगुफ्ता।

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