रिहा न हो सके

हुस्न पर पर्दा ऐसा था, दीदार हो न सका
मुग़ालते में ही रह गए,इज़हार हो न सका

फूल खिल गए थे गली गली बाग ए इश्क़ में
मैं रह गया पतझड़,अब्र ए बहार हो न सका

इश्क़ को माना था ,हमने इबादत की तरह
रोजा तो रख लिया,बस इफ़्तार हो न सका

खबर तो थी मुझे तेरी बेवफाई की सनम
मैं बना रहा खामोश,अख़बार हो न सका

मोहब्बत की थी तुझसे,तो निभाता रहा मैं
चाहा बहुत मगर ,तुमसे बेज़ार हो न सका

जमाने मे कहाँ मिली है मोह्हबत ए रिहाई
कैद में रह गए उनके, इनकार हो न सका
©मानवेन्द्र सिंह

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Behad umda

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धन्यवाद आपका

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Bohot hi khub!:+1:t2:

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धन्यवाद आपका😊