सीख गई हूँ

poem

#1

बंदिशों में भी ख्वाहिशें पालना सीख गई हूँ…
मैं अब रंजिशों में भी मुस्कुरा के बात करना सीख गयी हूँ;

हो भी ना वास्ता ग़र जज्बातों का…
तो भी मैं बातें करना सीख गयी हूँ;

कल तक पाल रखे थे वहम मैंने बहुत सारे…
अब सच को भी हजार बार परखना सीख गई हूँ;

मालूम था कल तक कि
रिश्ते प्यार की बुनियाद पर टिके होते हैं…
पर इनमें समझौतों के भी ईंट जुड़े हुए होते हैं,
इस बात की गहराई को भी समझना सीख गयी हूँ!!


#2

Welcome to YoAlfaaz @Rupa_dey first
Dusra, kya khoob likha hai tumne

ye line bahut gazab thi


#3

Thank you


#4

Well experienced words.


#5

Thnx