तन्हाई की रहबरी

एक तन्हाई ही है जो बिना कहे, सब कुछ बताती है ,
निग़ाह-ए-आईना से,हक़ीक़त से रूबरू करवाती है ।

एक पैकर-ए-ख़ाकी को मुन्तज़िर बनाती है ,
यह तन्हाई रहबर बन सिरात रास्ता दिखाती है ।

यह तन्हाई ही विरह गीत के बोल सजाती है ,
अकेले पथ पर बेतौर सा चलना सिखाती है ।

यह तन्हाई ही सोच की तीलियाँ जलाती है ,
यही वह क़ौसर-ए-इश्क़ है जो कलियां खिलाती है

यही मेरे कबीरा और शगिरा गुनाहों को गिनवाती है ,
मेरे बेबाकपन पर नापाकी के सवाल उठाती है ।

यह ज़िंदगी के उन अनदेखे पन्नो की दास्ताँ सुनाती है ,
जिन्हें महफ़िल में बयां करने से ज़ुबान कतराती है ।

मतलबी सी दुनियां में एक यही तो साथ निभाती है ,
मैं कहाँ कुछ लिखता हूँ ,सब कुछ यही लिखवाती है ।

  • शाहीर रफ़ी
2 Likes

Bhahut khoob @Shaheer_Rafi dost, tumhari poem, shayari me bahut maza aa rha hai,
bas yu hi yaha bane raho or hame apne post se khush karte raho

1 Like