एक ऐसा जहां

दीवारों पर लगी खरोंचे उसका दर्द बयां कर रही थी
इंसानियत तब एक कोने मै पड़ी बदनाम हो रही थी…
बंद कमरे मै आवाज़ उसकी अब भी गूंज रही थी
चीखती हुई चीखे आज भी लोगों को अंसुनी थी

दर्द से कापती हुई उसकी रूह अब दुनिया से आज़ाद थी
मगर आज भी उन लोगों की रूह आज़ाद हवाओ मै थी
उसके आंसू का मोल सिर्फ ये बना
की दो दिन तक शहर जला
दो दिन के बाद फिर एक हादसे से
इंसानियत पर कलंक लगा

ये बोझ उठाती इंसानियत अब थक चुकी थी
मगर कुछ लोगों की नीयत अब ना सुधर थी
ज़माने ने बस्स उसके याद
मै मोम बतियाँ जलाई
जिनको जलाना था बीच चौराहे पर
उन्हें सुधार केंद्र मै पनाह दिलाई…

रुक के किसीने एक पल तब ये ना सोचा
जब जब हादसा ऐसा सा हुआ
है वो भी किसीकी बेटी बहन माँ
क्या बस यही वजूद रह गया है उसका…

अब तो उस दौर से बाहर आओ
रिश्तों से बढ़कर उन्हें कुछ और पुकारो
उनकी इज्जत करने से बढ़ा ना कोई नाता होगा
एक बार बस्स इज्जत से उनकी आँखें तराशों

देख के आँखों मै तुम्हारी उन्हें कभी शक ना हो
अंधेरी गलियों मै अकेले चलने से उन्हें डर ना हो
रिश्तों मै जिंदगी बीत जाए उनकी ऐसा अब घर ना हो
के खुलकर जीये अब ये जिंदगी ऐसा एक जहां हो…

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Awesome @Shadesofmistakes
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