तू काहे की बनी है

तू उस धरती की उपज है जो बंजर है
जहां पानी नसीब ही नहीं
तू पौधा है वो जूझता सा
जो इतनी कड़वी धूप में भी सुदृढ़ खड़ा है
रुह को झिंझोड़ देने वाली लू में भी तू हिलती ही नहीं ज़रा भी
तेरे चारों और खडे़ कंटीले, जहरीले, जंगली पौधे
जो तुझसे ही बनते हैं
ये पुरा जंगल तेरे खिलाफ है जिसको तूने ही बनाया है
तेरी हर टहनी , हर पता बिखर गया है
फिर भी तू खुद को जोड़ने में लगी है
तेरे चारों ओर से तुझे हर कोई प्रताड़ित करता है
फिर भी तू डगमगाती नहीं
तू काहे की बनी है रे ?
जब ये पूरा जंगल ही तेरे खिलाफ है तो
क्यूं बनाया इस जंगल को ?

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Kya bat hai…
Well penned…

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