इश्क़नामा...।

shayari

#1

मुत्मइन इश्क़ में यूँ हुएं हैं ,
के न रोना आता है ,न हसना आता है ।
फ़ानी यादों पे इश्क़ क़ायम नहीं,
वह तो रश्क का फव्वारा है जो बह जाता है ।

                    - शाहीर रफ़ी 

जो इश्क़ करतें हैं ,बिना किसी सवालात के ,उन्हें किसी भी चीज़ का ग़म कैसे हो सकता है । क्योंकि उनके दिल-ओ-दिमाग़ में तो अपने मेहबूब का ख़याल ही हमेशा ग़ालिब रहता है । तो कोई बाहरी चीज़ कैसे उनके हस्ब-ए-हाल पर असर कर सकती है । उन्हें अपनी आशिक़ी से फुर्सत कहाँ ,जो अपनी कैफ़ियत पर नज़र डालें ।
और रश्क के लिए तो रत्ती भर भी जग़ह नहीं । उनपर अपने इश्क़ में क़ामिल होने के लिए, महबूब का जिस्मानी तौर पर मौजूद होना लाज़मी नहीं । वह तो रूहानियत के मुक़ाम में ,सादिक़ हो चुके हैं ।अगर अपने महबूब को किसी दूसरे के साथ देख ,आँखों से अश्क़ बहते हैं तो माफ़ कीजिएगा वह इश्क़ नहीं बल्कि हिर्श है जो इंसानी जज़बात का कनीज़ होता है । इश्क़ तो इन बातों से परे ,एक अलग ही कैफ़ में रहता है । वह तो रश्क है जो आंसूयों सा बह जाता है ।

Word meanings :
मुत्मइन - a state of tranquility, Stable state.
ग़ालिब - dominant
कैफ़ियत - हाल ,state of mind .
रश्क - ईर्ष्या , jealousy.
क़ामिल -परिपूर्ण ,accomplished.
लाज़मी - neccesarily .
हिर्श - jealousy .
कनीज़ - ग़ुलाम,slave.
फ़व्वारा - fountain .


#2

just amazing… very nice :slight_smile:


#3

Maza hi aa gya
Sabdo ka bharpoor upyog ho raha hai
or puri khichai alfaaz ki ho rhi hai

:wink::wink::wink: