लड़की हूं शायद इसीलिए

poem

#1

लड़की हूँ! शायद इसीलिए

हर सवालों का जवाब देती हूँ

अपने जन्म के लिए संघर्ष करती हूँ

दुनिया में आने के लिए,

इस रंगीन दुनिया को देखने के लिए

संघर्ष करती हूं जन्म ही संघर्ष है

पता नहीं क्यूं,शायद लड़की हूँ इसलिए!

खुशकिस्मती से जीत हासिल कर भी लूं

तो क्या, संघर्ष फिर भी जारी है

घर में, समाज में,सिर झुका के रहती हूँं

हर किसी की बातें सुनती हूँं

चाहे अच्छी या बुरी चुपचाप खड़ी सुनती हूँं

सवालों के चक्रव्यूह मुझे ही घेरते हैं

हर बार अग्निपरीक्षा में खुद को पातीं हूँं

शायद लड़की हूँं इसलिए

लड़के चाहे जो करें

गलत हर दफा लड़की ठहराई जाती है

मान-सम्मान की दुहाई क्यूं हर बार

लड़कियों को ही मिलती है

कपड़े ऐसे पहनो, वैसे पहनो

लड़कियों को सिखाते है

पता नहीं क्यूं

लड़कों को तमीज सिखाना भूल जाते है

देर करते लड़के अगर घर आने में तो

कोई बात नहीं

घर जल्दी आना तो लड़कियों का कर्त्तव्य है मानों

मां-बाप को चाहिए लड़का,

पर सेवा तो करती हैं लड़कियां

हक मारकर लड़कियों का दें देते हैं लड़कों को

वंश है, चिराग है, बस इसी मोह में

दुलार सारा लड़कों को

जिम्मेदारियां सौंपी जाती है लड़कियों को

हर मर्तवा लड़की हूं ये एहसास होता है

हर मोड़ पर मुखालफत होती है मेरी

चुकानी पड़ती है कीमत इसकी

पता नहीं क्यूं शायद लड़की हूं इसलिए


#2

Zabardast likha hai @Mayuri_Vats tumne
Jitna accha topic chuna, utna hi accha likha

Mujhe Khushi hai ki yaha (YoAlfaaz) pe, sabhi bahut acche topic chun or likh rahe hai,
Bahut khoob


#3

Welcome to YoAlfaaz.
Keep contributing.


#4

I am speechless, very well composed. I wish your poem reaches as many people as much possible :slight_smile: