जज्बा मेरा

लोग कहते रहे हम लड़ते रहे
नामुमकिन को मुमकिन करते रहे
उस डगर पे चले जिसकी आशा ना थी
कभी गर्मी कभी सर्दी सहते रहे
पाव थम सा गया दिल ने फिर भी कहा
हम थकेंगे नहीं साथ तू जो चले
उम्र बढ़ता रहा दम निकलता रहा
मंजीले राह की फिर भी बढ़ती रही
हम भी चलते रहे बस यही सोच कर
मंजिल ही ज़िन्दगी का सहारा है अब

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