एक दीवाना था।(पार्ट 2)

शादी में जब पहुँचे तो काफी लोग आये हुये थे। बहुत बड़े पैमाने पर शादी का आयोजन किया गया था। चूँकि अक्षत और उसका परिवार ख़ास किसी को जानते नहीं थे वे बस एक कोने में कुर्सियाँ ले कर बैठ गये और आपस में बातें करने लगे।
“मीना! बस अब तेरी शादी भी जल्द ही कर देंगे।“ अक्षत की माँ रमा बहन बोली।
“मेरी शादी क्यों? भाई तो मुझसे बड़ा है। पहले भाई की शादी तो करवाओ। मुझे एक सुन्दर सी भाभी चाहिये।“
“अरे पगली! कुँवारी बहन होते हुये में कैसे शादी कर सकता हूँ? पहले तुम्हारी शादी होगी।“
अक्षत ने कहा तो सही पर अपनी शादी की बात सुन कर उसके मन में लड्डू फूटने लगे थे। उस लड़की का ख्याल दिल में आ गया।
“यह देखो दूल्हा और दुल्हन मंडप में बैठ गये। अरे! यह तो वहीँ लड़की है जो हमारी दुकान पर अक्सर आती-जाती रहती है। सच में दुनिया छोटी है।“अक्षत के पापा मनहरलाल ने कहा।
अक्षत ने देखा तो दुल्हन के लिबास में वही लड़की थी जो उसके दिलो-दिमाग पर छाई रहती थी।
“लड़की तो बड़ी खूबसूरत है।“रमा बहन ने कहा।
“हाँ! भैया आप भी ऐसी ही खूबसूरत भाभी लाना।“
अक्षत बेचारा क्या बोलता!? उसके सर पर तो जैसे आसमान तूट पड़ा था। आँखे नम हो गई थी। पर उसने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल लिया।
फेरे शुरू हुये और देखते ही देखते खत्म भी हो गये। अक्षत बूत बनकर खड़ा था। अपने ख़्वाबों की हूर को बस देखता रहा।
“दूल्हा-दुल्हन को बधाई देने चलते है।“मनहरलाल बोले।
वे मंडप में पहुँचे। दूल्हा और दुल्हन को बधाई देने कई लोग खड़े थे। किसी ने कहा, “काँग्रेट्स! तनूजा। काँग्रेट्स जीजाजी।“
तो उसका नाम तनूजा था। जैसी प्यारी थी वह वैसा प्यारा उसका नाम था। आख़िरकार अक्षत को उसका नाम पता चल गया था लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

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