ख्वाब _ए _दास्ताँ

वो ख्वाब,
बंद आँखो ने नहीं,
खुली आँखों ने सजाया था जिसे…!
पूर्ण होने की उम्मीद न थी,
लोगों के दर्पण को निहारा जब से…!
:disappointed::disappointed::disappointed:
फिर एक धुँधली रोशनी से परिचय हुआ,
जिसने ज्ञान का दीप जलाया मुझमे…!
देख तेज रोशनी का,
ख्वाब को नई चमक मिली थी जैसे…!
:blush::blush::blush:
रूप देखा सच्चाई का जब,
ख़त्म हो गया सब कुछ जैसे…!
:slightly_frowning_face::slightly_frowning_face::slightly_frowning_face:
जब ख्वाब पूर्ण ही न करना था,
खुशियों को झोली में न भरना था,
क्यूँ उससे परिचित कराया…?
क्यूँ उसको ही भगवान बनाया…?
:rage::rage::rage:
ख्वाब जो फिर से,
अधूरा रहा है…!
ख़्वाइस का पुल भी अब,
चकनाचूर हुआ है…!
:unamused::unamused::unamused:
गिरेबान का भी अब ऐसा हाल हुआ है,
ये सब कहने के लिए कभी न कोई अल्फाज़ मिला है…!
:unamused::unamused::disappointed:
Kittu_ki_diary

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so nicely penned!! keep it up :+1::slight_smile:

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@parmesh_chavan Thank you

Very well composed…
Keep writing and sharing :two_hearts::kissing_heart::heart_eyes:

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@Wordsbyritti thank you :innocent:

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