एक दीवाना था।(पार्ट 1)

“मोहब्बत सिर्फ एक लब्ज़ नहीं पर एक खूबसूरत एहसास है। एक बार हो जाये तो…”
अक्षत ने रेडियो बंद कर दिया। बेचारा रेडियो-जॉकी कबसे प्यार पर भाषण दे रहा था। और वह करता भी क्या!? वैलेंटाइन डे जो था। हर कोई जैसे प्यार, इश्क़ और मोहब्बत की बात ही सुनना चाहता था। सिवाय अक्षत के!
चलो, अक्षत के बारे में कुछ जानते है। ज़्यादा नहीं पर थोड़ा सा। आखिर कहानी का नायक जो है। अक्षत एक चौबीस साल का लड़का है। अपने पापा की दुकान पर बैठता है। पापा तो चाहते थे की बेटा पढ़-लिख कर नाम कमाये पर पढाई कभी अक्षत के पल्ले पड़ती नहीं थी। जैसे-तैसे कर के बारहवीं तो पास कर ली पर कॉलेज के पहले ही साल में साहब चारों खाने चीत। फिर क्या था? बस पढ़ाई छोड़ दी। पापा ने भी मन मना लिया। माँ को अक्षत ने मना लिया। घर से दुकान और दुकान से घर। बस यहीं थी अक्षत की ज़िन्दगी। पर एक दिन एक लड़की दुकान पर दाल लेने आई और हमारे साहबज़ादे का दिल ले कर चली गई। बस उस दिन से ना रातों को चैन ना दिन में सुकून। बस हर पल इंतिज़ार। अब यह तो होना ना था कि वह हररोज़ आती कुछ ना कुछ लेने को। हाँ, इतना था कि कभी कभी गलियों से गुज़रती तो अक्षत के दिल को तसल्ली मिल जाती उसे देख कर। कभी-कभार भला दुकान पर भी कुछ लेने आ जाया करती थी। अक्षत चाहता तो था कि उससे बात करें। कम से कम उसका नाम जान ले। पर पापा भी साथ होते तो यह कुछ मुश्किल था। एक दिन अक्षत रोज़ की तरह दुकान पर बैठा था कि…
“अक्षत! आज दुकान जल्दी बंद करेंगे। हमारे एक व्यापारी के वहाँ शादी में जाना है।“
“क्या यहीं से जाना है?”
“नहीं। घर से मीना और तुम्हारी माँ को भी लेते चलेंगे।“

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