देहरी से परे सपने

देहरी से परे सपने


सुलझे उलझे से
ख्यालो में लिपटे ,
अनमने अटपटे से
अनगढे ख्याल।
रेखाँए खींच देने को आतुर,
किस्मत की चालों से परे ।
एक बस्ती सी ख्वाब की है ,
घर -देहरी से परे।
कभी आना हुआ तो देखना
धूल धूँए से सने,
चूल्हे की परली पार ,
नींद की तार पर लटके है
सपने।
देहरी से बाहर ,
अनजान दुनिया मे जाते हुए,
कच्चे शब्दों के पके सपने ,
कुछ सोए, कुछ जागते सपने,
अबके फुर्सत मे तौलेंगे,
कितने असली ,कितने नकली
सपने।
सरहदें तोड़ने को आतुर,
सीमाओ की हद के परे,
गीली-सीली सी मिट्टी में
गूँथे,
कुछ संवरे से सपने है उस
बिखरे बालों वाली लड़की
के ।
©कविता वर्मा

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