प्रतिबिम्ब

प्रतिबिम्ब

मैं हर रोज़ उस हिलते पानी मे
देखती हूँ एक प्रतिबिंब।
कोशिश करती हूँ ,छूने की वो
तस्वीर।
चंचलता मे स्थिरता को
खोजती हुई
अपनी नयी परिभाषाँ
बाँधते हुए
हर प्रयत्न, हर कोशिश प्रेरणा
के बाँध ।मै सपने देख लेती हूँ ,
मुठ्ठी भर सितारों के।
और स्याह रातों में लिपटे
अअंधकार
को रोशनी मे भरने की
नाकाम कोशिश
हर बार उस हिलते पानी में
समर्पित हर प्रयत्न
पन्छियों से उधार लिए परों
सें ,
जानतीहूँ बड़ा है आसमा ,
और उड़ान मुश्किल।
पर कोशिश जारी रखनी है,
जब तक छू न लूँ उस हिलती हुई
परछाई को ।
और पा के उसे पूरी ना कर लूँ
अपनी तस्वीर ।।
©कविता वर्मा

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Nice poem🙂