नया आयाम

नया आयाम

बागी हूँ ! रीति और
रिवाज़ो से,
बंध,छंद की मुड़ी-तुड़ी प्रथाँए
,
कहाँ बाँधें ;
देखा है तुमनें उड़ती हवा के पर ,
खुली खिड़की की निश्चल
कल्पनाँए ।
खोल दिया आज किवाड़
पुराना ,
दृष्टिकोण , सुखद ,सम्पूर्ण !
अडिग ,सुँदर है नये कदम ।
नया विश्वास सजाया आज
,
फेंक पुरानी ओढनी, संस्कृति
की नयी अगुवाई ।
बागी ! हूँ समाज से
रीति और रिवाज से।
रंग घोल दूँ ,आज नये हवा मे
अपने हिसाब से ।
मोड़ दूँ हर लहर ,
कश्ती रगींन ख्बाव की
बागी! बँधे मेहराब की ।
ओढी चुनरी सुखद अहसास
की !
कुचल आज पुरानी पतवारों
को,
तैरना है उफनते मझधार में।
~kv~ —
©kavita Verma

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