फासले रखो हम से

फासले रखो हम से, के हमे डर लगता है.
तन्हाई मे ही हमारा हमे घर लगता है.

टूट ना जाए किसी का दिल हमारे हाथों,
ऐसा ये डर हमे अक्सर लगता है.

घर से जो निकले तो फिर हम घर नहीं जाते,
अच्छा ये हमे सफ़र लगता है.

होगा ‘’ मोम’’ किसी का तो, हमें क्या,
दिल ये सबका हमे पत्थर लगता है.

अपने ज़ख्मों को ख़ामोशी की दवा देते है,
शोर शराबा ये हमे बेअसर लगता है.

नज़दीकीयाँ अब नहीं रखते हम किसी से,
राबता भी हमे दर्द-ए-सर लगता है.

इस तरह उठ गया है भरोसा दुनिया से,
के कोई गुलाब भी पकड़े तो हमे खंजर लगता है.

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loved each line…:heart::heart:

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Thanks Sadiq.