आज राख हूं मैं

आग बेहेती थी रगो में,
कोयला सा तप रहा था,
जल गया इतना कि
आज राख हूं मैं।
ज़िन्दगी की दाब से मैं
मूरत में ढल रहा था।
ठोकरें इतनी पड़ी कि
आज खाख हूं मैं।
मैं वो कहानी हूं जो
पन्नों पे कभी उतरी नहीं।
सफेद पन्नों पर लगा
एक काला दाग हूं मैं।
घूमता था मैं कभी
फूलों का सरताज लेके।
रंगीन बहारो में आज
एक सूखा शाख हूं मैं।

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Beautifully penned

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Welcome

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lajawab :clap:

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