गजल (प्रहेलिका)

गजल

ज़हन में तेरे उलझे, सुलझ जाऐ ‘प्रहेलिका’
कुछ यकीन दिला,कोई कवायद तो कर।

तब्दील ‘घर में’ ‘दिल का मकां’ कर जाऐ,
तू ईंटो की,पत्थरों की,हिफाजत तो कर।

हैं बेहिसाब कीमती , फकीरी उल्फत की,
कि तेरे दाम में थोड़ी-सी गिरावट तो कर।

अभी भी वक्त हैं, महशर की रात आने में,
तू मगरूरियत से अपनी बगावत तो कर।

इब्तिदा-ऐ-इश्क में ‘बोसे’ को ‘रस्म’ कहता हैं,
तू रिवाजों को निभाने की रवायत तो कर।

ये जीस्त मुसल्सल सी, टिकेगी कब तक,
मेरे मालिक मेरे काविश की फ़राग़त तो कर।

मुझे है इल्म, तुझे इश्क की दरकार नही,
खैर तू इश्क न कर, बदस्तूर दिखावट तो कर।

रिया ‘प्रहेलिका’
#riya_prahelika
महशर=कयामत
काविश की फ़राग़त= आराम/श्रम की समाप्ति

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Very nice and interesting start @Riya_Prahelika :slightly_smiling_face:
Aapka swaagat hai

Welcome to YoAlfaaz family and
keep writing and sharing :slightly_smiling_face:

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love it😍
…isqh na kr , badastoor dikhawat to kr :pensive::pensive: