अंधेरे में उजाला

अन्धेरे मे उजाला


एक एक नही हजार ,
शब्दो से उजला है मेरा वजूद।
तुम भुल जाओगे अंक,शब्द और
वर्णमालाओ को।
कया गिन सकोगे ,
नदी की निर्मलता,
अनंत आकाश ,
मन की दुर्बलता,
या पृथ्वी की विशालता ।
नदी का बहाव रखती हूँ ,
समन्दर को पा जाऊगी ।
खोकर मधुरता ,
खारेपन को होगा आमन्त्रण।
तब तुम गिन पाओगे मेरे
सामाजिक खारेपन को।
तब सब मापदण्ड टूट जाएगें ।
uतुम गिन सकोगे मेरी
सामाजिक विफलता ,
किसी रूढ़ सामाजिक दृष्टि
के दृष्टिकोण से।
जब मै मधुरता को खो के
तुम्हारा सामाजिक खार
अपनालूंगी।
तब तुम आना मेरे आलोचक
बनके।।
~kv~
©कविता वर्मा

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so good to see you back @Kavita_Verma :slight_smile:
and nice poem :slight_smile:

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Thank you sir…:bouquet::bouquet::bouquet::+1: