रूपांतरित

रूपांतरित
,
एक समंदर है मेरे वजूद में ,
जो ढूलता है,
बहता है,
रिस्ता है,
मेरे भीतर ,मेरे बाहर,और तमाम दिन मैं बह जाती हूं ,
अपने ही शब्दों की लहरों से,
इस पर ,से उस पार
कभी किनारे दर किनारे ,
अपना वजूद तलाशती,
अपना सार सवारती,
मेरे ही विचारो को विचरती,
मैं लहरो में मौज भी हूँ ,
और सागर का किनारा भी,
मई कश्ती की खोज भी हु।।
चलती रहती हूं इसी सागर में ,
ये सागर चलता हे मुझ में।
खो दिया हैं गहराइयो में
एक तस्वीर को,
एक पहचान को
समय को
पहरों को
लेकिन तुम देखो मै चल तो रही हु ,
सागर से ,सागर में , निरंतर ,लगातार,लहरो सी
खोके ,फिर से पा के ,
देखा तुमने,हर बार की वजूद छोड़ के नदी तो नही बनी,
जो सागर को समर्पित है,
खोया नही खुद को ,
बस समंदर बना दिया ,
दे दिया खुद को पूर्णरूप ,
खो दिया और पा लिया ,और बचा भी लिया ,
सामाजिक अधूरेपन के दंश से ,
अब में ही मैं हूँ ,इस पार से उस पार,
बस खोया इतना हैं अपने किनारे नही छूती।
रहती हूं खुद में अनछुई सी, पूर्ण सी,स्त्री बन के,
एक सागर बन के,
©कविता वर्मा
4:27am
12december

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Behad khubsurti se likha he

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Wicked!