*****सुबह*****

!! सुबह !!
जब तुम उगती हो ,
मेरे ठूंठ से शाख पर,
हर रोज़ एक नया जीवन ,
उग आता है।
नयी प्रकृति सजती है,
हर रोज़।
सुबह तुम जीवन का निर्माण करती हो
हर रोज़ मेरी तरह।
ले आती हो एक सूरज ,
समय से परे क्षितिज
के धरातल पर।
एक नया आयाम बन जाता है
मेरी चौखट पर ,
हर रोज़ ।
मैं भी चलती हूँ ,
जब तुम चलती हो।
उस छाया वाली किनारी पर।
जिस पर से तुम आती हो,
और देखती हूं तुम्हारा क्षीण होना,
साँझ के आने तक।
ताकना और देखना तुम्हे ।
धुंधली हो जाती हो तुम ,
पच्छिम में जाकर,
लेकिन फिर से बनने और आने का
साहस है तुममे , रात को पार करके
अकेले आ जाती हो ।
अगली तारीख बदलने तक।
मुझे भी रखो ना पास ।।

आठवी घडी तक ।
अपने पास ,अपने सा।
फिर से पूरब से आने तक।
©कविता वर्मा

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