खाली पन्ना

खाली पन्ना।


इस बार भी ना रिता सकी मन।
कुछ बोझ भर सा है।
जो उठता नही मन से ,
और गिरता नही देह से।
स्वछन्द सोच।।
हाँ नही मिलते ऐसे अक्षर,
जो खोल सके मन की परतें।
हर बार सोचती हूं रंग भर दूँ अक्षरों के,
कोरी कल्पना और शब्दों के केनवास पर।

और मिला दूँ उस बोझ को ,
इन हलके वर्णो से ।
बन जायेंगे गीत से।
पर रह जाता हैं हर बार यही सब ,
और फड़फड़ाता है "
मन का खली पन्ना"।।


शब्दों को चुनना,
शिकायत सी होगी।
सोच से कलम रूठ जाएगी।
अनगिनत ,असीम,उलझे विचार ख्याल,
लिखना चाहा है, इसे कई बार।
कलम सीधी करके ,
साथ नही दे पाती ये ,
शब्द नही दे पाती ये,
उन उफनते विचारो को।
सच दे!सामाजिक स्याही और विद्रोही विचार।
और वक़्त भी नही रुकता ,
सोच के साथ,मुह फेर के आगे बढ़ता है।
खाली पन्ने सा फड़फड़ाता है।
©कविता वर्मा
~Kv~

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