मेरे प्रिय

।। प्रिय ।।


कभी देखा है तुमने,
बदलते मौसम के रंगों को ।
या के देहरी के उस पार ,
बिखरे सपनो को।
मेरी कविता और
तुम्हारी कल्पना में गुंथे
अहसास के बांध को ,
एक एक वर्ण
पिरोया जाता है कैसे ,
तो आओ प्रिय!
चलें क्षितिज के उस पार
के बादलों तक।
पकी फसल सी सूंदर ,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान
पर ढलते शाम के रंग ,
मलने दो गिरते सूरज को।
रहने दो कायम इसे ,
मेरे आने तक ।
और इंतज़ार करो तब तक मेरे आने का,
जब तक ये बीच का रिक्त स्थान ,
जो वीराने गूंज से
खोलता -खौफता है,
प्रेम से खुद को भर न दे।
प्रिय! !

©कविता वर्मा
~Kv~

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Incomparable!