सुनो कल्पना

सुनो कल्पना।।

कविता हूँ मैं तुम्हारी,
अधूरे छंदों की पूर्ण अभिलाषा,
करती जब जब तुम,
बाँध देती हो अलंकार और रस रंग।
उस वक़्त ,तुम सृजन करती हो मुझे।
नया स्वरुप कभी प्रकृति का कभी परिवर्तन ।
तुम ढाल देती हो मुझे नये नये सांचे में।
जब जब तुम देखना चाहती हो मुझे
अपने सा मुझ में।
सुनो कल्पना ,तुम और मै
और मैं और तुम।
क्या देखा हैं तुमने बिना आसमान के पानी
या के बिना बिना पानी के आसमान ।।
दोनों एक हैं रंग सांझे करते हुए.
उसी तरह तुम ,
अपने रंग मुझमे भर देती हो।
और मई तुम्हारा सा रूप जीती हूँ।
जब जब तुम होती हो बागी सी ,
मैं भी बन जाती हूँ नयी रिवाज़ सी।
सुनो कल्पना , कहाँ से लाती हो ये विचार!
रोज़ मुझे रच कर तुम ,
मेरी कुंडलियो में ,
सुवास सी महकाती हो मुझे ।
सुनो कल्पना तुम भी कविता हो ,
और कल्पना हूँ मै भी,
ये किरणे जो तुम अपनी हथेली से मल
देती हो मुझ पर,
सूरज सी उग आती हूँ पूरब से
और रहती हूँ तुम सी पच्छिम में जाने तक।
सुनो कल्पना तुम रचते रहना मुझे
और मै व्यक्त करती रहूंगी तुमको।।
©कविता वर्मा
7:56am
26 april

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Terrific!

प्यार हो गया हम आपकी रचनाओं से। :heart_eyes:

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