उपजाऊ आंगन

उपजाऊ आंगन।।


मैं मेरे भीतर , और कई ऐसी कवितायेँ हैं।
जो मैं को मैं से गुणा करके ,
विभाजित ही करती है मुझे,
मेरी तन्हाइयो से।
जब जब मैं मुझ सी ‘कई’ जाती हूं,
रेशम बिखर जाता है,
मेरी ईंटों की ईमारत में।
और बन जाता है एक हरा आँगन ,
सिमट जाता है वर्तमान
और पसर जाता है भूत,
रोक कर भविष्य के किवाड़ को।
तब होता है वही पुराना शहर।


जब मैं मुझ में कई हो कर ढह जाती हूं,
अपनी ही नींव पर ,
पर तुम ना देखना मेरी हार,
मेरा पड़ाव ,समय के परे, मेरा पतन।
ये रुका भूत छलावा है,
समय की कनखियों से,
भविष्य चल रहा है।
और मैं फिर से उठुंगी,
नींव के भीतर से संचार होगा ,
नये काल का।
क्योंकि मैं एक नही हूं ,
क्योंकि तुम नही देख सकते,
मेरा विस्तार ,
मेरा उपजाऊ धरातल,
जो ऊगा देता है मुझ में मैं , और मै से हम ।
मैं बढ़ रही हूं, रुके समय की काई पर,
उग रही हूं खरपतवार सी,
बिन सामाजिक खाद ।
परिवर्तन की चाह में।
अपने आप में अपनी सी उन्नति,
अपनी ही नयी उत्पत्ति।
©कविता वर्मा।
9:13pm 20जून।

5 Likes

Hey, lovely write up. :heavy_heart_exclamation:
Welcome to YoAlfaaz. :heavy_heart_exclamation:
Keep writing and sharing. :blush:

2 Likes

Thank you :bouquet::bouquet:

1 Like