उनसे आखरी मुलाकात

आज़ मैँ रूबरू हुई उनसे,
न उनकी नजरे हमसे टकरायीं,
न हमारी आँखो ने ये जूरर्र्त की,
अज़ीब सी बेचैनी थी,
दिल मेँ कसमसाहट सी थी,
लबों पे बहुत कुछ था,
पर जुबाँ सील सी गयी थी,
यू उनका हमे चोर नज़रो से देखना,
औऱ एक बार फ़िर,
उन ज़ालिम नज़रो क़ा टकराना,
औऱ आँखो ही आँखो मेँ,
बीते कूछ महीनो क़ा दर्द,
बिनकहे ही बयां हो जाना,
औऱ दोनो की पलकों क़ा,
यू नम सा हो जाना,
उस दफ़न पड़ी,
मरी हुई मोहब्बत,
की गवाही कब्र से दे रहा था,
औऱ कुछ नहीं,
बस एक दूसरे की जाली मुस्कुराहट क़ो,
जान कर भी सह़ी मान लेना,
शायद सबकुछ तक़दीर पे छोड़ देना,
यहीं सह़ी था, यही सह़ी था,
दोनो की पलके बार-बार,
पानी क़ो बहने से रोकती रही,
औऱ चाह कर भी दोनो,
अपनी पलकों क़ा भार न कम कर पाए,
औऱ सबकुछ बस पीछे छोड़ आए,
औऱ सबकुछ बस पीछे छोड़ आए॥

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बहुत खूब! Well written :slightly_smiling_face:

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Thank you so much