हवा के दोश पे रखे हुए चिराग़ थे हम जो

हवा के दोश पे रखे हुए चिराग़ थे हम
जो बुझ गए तो हवाओं से शिकायत कैसी
अब जो बिखरे, तो बिखरने की शिकायत कैसी
ख़ुश्क पत्तों की हवाओं से रफ़ाक़त कैसी

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So nicely written. :heart:
Welcome to YoAlfaaz, dear. :blush:
Keep sharing. :blush::heart:

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बहुत खूब!:+1:t2::slightly_smiling_face: