ग़ज़ल(कहते हो सबकी शान में क्या)

कहते हो तुम सबकी शान में क्या
घुली है मिश्री तेरी जुबान में क्या

तुम नहीं तो इस घर में कुछ नहीं
रखा है अब इस मकान में क्या

है मातृभूमि ये तेरी अपनी धरती है
ढूँढता है चीन और जापान में क्या

यादों को अपने दिल में बसा कर रख
सहेजने को रखा इस सामान में क्या

नतीजे आएँगे तो खबर हो ही जाएगी
रखा है इस चुनावी रुझान में क्या

झूठ, कपट, छल साथ लिए रहते हो
मिलेगा फल किसी दान में क्या

होंसलों को पंख देना बाकी है अभी
उड़ना नहीं खुले आसमान में क्या

अमिता गुप्ता मगोत्रा
स्वरचित

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:heart::heart: