जिंदगी की कीले

जिंदगी के दोराहे पर वो मिली मुझे खड़ी मुरझाई सी, आंखों का सामना वह असफलता के साथ कर रही थी, खड़ी सबके सामने बड़ी मुश्किल से हो रही थी, एक सदमा कहीं था उसकी दुनिया में, जो मुझे दिखा जब मैंने देखा उसकी आंखों में,साथ साथ चलना शुरू किया तो, सदमों की बारिशे सी लगी हुई थी, मैं चुनता जा रहा था, लोग बिछाते जा रहे थे, यह एक इंसान का इंसान के लिए किया गया जो प्रयास था, यह एक इंसान का इंसान के लिए किया गया जो प्रयास था, जो उसने अपनी इमानदारी और मासूमियत से हासिल किया था, कितनी कीले गड़ी हुई थी जो उसके अंतर्मन में, कितने कीले गड़ी हुई थी जो उसके अंतर्मन में, कोई अंदाज़ा ना था उसकी गहराइयों का, जितना गहरा में उतरता जा रहा था, उतनी कीले मिलती ही जा रही थी, उतनी ही कीले मिलती ही जा रही थी, मौसम के बदलने के साथ-साथ मैं भी लहूलुहान हो चुका था, मौसम के बदलने के साथ कुछ बदलाव भी जो आ चुके थे, अब जितनी कीले लोगों ने गाड़ रखी है, वह एक दिन उन्हें ही वापस मिलेंगे यह सोचकर शायद मौसम भी घनघोर घटा ला चुका था, बादलों के अंधकार में कोई दिख ना रहा था, डोर जो साथ चलने की थी, कहीं समय कि आंच में कमजोर सी जो हो चुकी थी, अंधकार ही अंधकार छाया जो दिख रहा था, लेकिन दूर कहीं क्षितिज पर एक कमजोर सी किरण दिख रही थी, ऐसे झिलमिला रही थी मानो कीलो की पीड़ा में हो, ऐसे झिलमिला रही थी मानो कीलो की चुभन की पीड़ा में हो, किसी के इंतजार में तड़प रही
थी, मगर दुनिया कीलों को ठोक ठोक कर अपनी राह बनाने में व्यस्त थी, चाहे वो शरीर पर हो या किसी के दिल पर हो, किसको परवाह, किसने किसके लिए कितनी सारी कीले ठोक रखी है कितनी सारी कीलें ठोक रखी हैं।

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Welcome to Yoalfaaz
@Ashish9Singh
Good post

Welcome to the world of writing my dear fabulous