आगे बढ़ चली

जिंदगी कि भीड़ में धक्को से मैने चलना सीखा,
उम्र से नही परेशानियों से उबरना सीखा,
कुछ खोया कुछ पाया,
बस अपने संग सबकुछ समेट कें चलना सीखा,
दीदार को मेरे अब तरस रहे हैं,
रात औऱ दिन बस गिन रहे हैं,
सोने कि लंका से मैं उड़ चली
इस गगन कि ऊंचाई को मैं पाव-पाव नाप चली,
कौन रोकेगा मुझे अब जब सबकुछ पीछे छोड़ मैं आगे बढ़ चली॥

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Wow… Behtareeen