करवां जिंदगी क़ा

जब सड़को में निकली तो,
एक नन्ही सी जान ने,
सोने की नगरी में सिसकियाँ ली,
खुली हवा में सांस ली,
लोगो को देख कर मन बहलाने की कोशिश की,
ख़ुद को यक़ीन दिलाने की हिम्मत की,
ख़ुद से कहने की जूरर्र्त की,
अकेली तु ही नही ये सारा जहान भी हैं,
ख्वाब सिर्फ़ तेरे ही नही इनके भी हैं,
यू जब मैँ आगे बढ़ी तो सबकुछ करवां सा बनता गया,
लोग आते गए औऱ रास्ता सा बनता गया,
उन उसूलों को अपने आँचल में यू बांध के मैँ चलती गयी,
लोग आते गये मेरा रास्ता आसान सा होता गया! हॊता गया॥

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