यादों क़ा ताना बाना

जज़्बातों को जब हम उकेरने चले,
तो हर अल्फ़ाज़ में तुम्हारा ज़िक्र हॊता चला,
तुमसे जितनी दूर होने कि कोशिश करते गए ,
उतने ही करीब ख़ुद को पाते गए,
तुम जैसे हमें छोड़ गए थे,
वैसे हीं यादो कि महफ़िल को भी छोड़ जाओ,
हर बार कि तरह इस बार भी हमें गुलज़ार कर जाओ ,
ना तेरे लौटने कि उम्मींद ना तेरे जाने क़ा ग़म,
बस ख़ुद को तुझमे खोने क़ा दर्द औऱ बेहिसाब यादो कि जंग,
यू मुकद्दर से भी लड़ने को तय्यार थे हम तेरी मोहब्बत कें लिए,
तुम हीं लड़ गये हमसे इस ज़ालिम दुनियाँ कें लिए,
अश्को में डुबोति तुम्हारी वो यादें,
हरा पल भीतर से जला जाती हैं,
कभी आकर कभी जाकर रुला जाती हैं,
लेकिन लौटना ना तुम इन गलियों में,
ये महफ़िल अब यारो कि नही कहलाती हैं,
ये महफ़िल अब यारो कि नही कहलाती हैं॥ ॥

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Superb poetry

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Thank-you so much :heart:

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Wow

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Shukriya :pray:

You’re welcome :blush:

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