अंतिम संस्कार

उस शाम की चाय के बाद
याद रहा ना कुछ ख़ास
बस वो बिस्कुट की प्लेट
कुछ बच्चों की आहट का साथ
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कब रात हुई, कब सुबह
बिन बताये ही आया न्योता
आँखें खुली ही नहीं
रह गया एक ही दशा में सोता
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वो बेजान तन कुछ कह रहा था
सिसक सिसक कर रो रहा था
ले जाओ मुझे ,मेरा अब क्या काम
बस अंतिम संस्कार के लिये ठहरा हुआ था
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कैसे बताऊ अब सबको कि चाय के समय
मैं क्या सोच रहा था, काश कि लिखा होता
खत कोई जो बयां करता उस पल को
जब मैं जी रहा था
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वो सपने कैसे पूरे होंगे अब
जो रह गए अनछुए
मेरे कुछ काम बचे हुए थे
पर मैं तो गंगा जी में बह रहा था
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मेरी पत्नी दूर कोने में कहीं
खुदको कैसे जा रही थी
बेटी की आँखों में से तो
पानी की बूँद तक नही आ रही थी
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मेरी माँ तो बस हक्की बक्की सी खड़ी थी
बेटा तो कुछ कह भी नही पा रहा था
मैं होता तो लड़ता मुझसे
पापा अपने क्यों इतना ज़िम्मा उठा रखा था
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ज़िन्दगी में जीया हूँ
दिल भी कई बार तड़प चुका था
मैं अनंत भी हूँ
मेरा शरीर भी जल चूका था
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हर त्यौहार पर लाये गए ,नये कपड़ों की पोटली
अब कोने में पड़ी है
वो सोने की चैन
मेरे गले में ही जल चुकी है
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वो काश में हुई करती थी जो बातें
हर बात रो पड़ी है
किस बात पर खफा है, में तो अभी ज़िंदा हूँ
तू क्यों चल बसा है

साक्षी शर्मा
Screative_soul

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emotional post …loved it :heart:

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Hey, welcome to Yoalfaaz @Sakshi_Sharma
Looking forward to read your other posts

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Thankyou so much​:heart::heart:

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