मैं और प्रकृति

ये झोंके हवा के,
ये गरज बादलों की,
ये बुँदें बारिश की,
सब मेरी तरफ इशारा कर रहे हैं;

है कितना क्षयी वजूद मेरा…
सब अपने-अपने हुनर से ये बता रहे हैं;

हाँ, मैं भी कुछ ऐसी ही हूँ
इन हवाओं की तरह, विमुक्त और दिशाहीन;
इन बादलों की तरह, खामोश कभी तो कभी चीख़ से गमगीन;
इन बुंदों की तरह, जो हो जाता है पल में ही विलीन;

हाँ, मैं हूँ ही ऐसी…
इस प्रकृति से बहुत मिलती-जुलती।।

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@Rupa_deyबहुत खूब… :ok_hand::+1:

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Kya baat, kya baat, kya baat
:clap::clap::clap:

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Superb…claps…

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