बाज़ार

इक बेवफा का ही सही हमें प्यार तो मिला।
दर्दे जिगर को दो घडी करार तो मिला।

कहकर गये थे गम न कर आयेंगे एक दिन।
झूठा सही किसी का एतबार तो मिला।

खुश हो रहे थे यार हम अपने नसीब पर।
लोगों में ज़िक्र था उन्हें शिकार तो मिला।

जिसको तमाम उम्र हम तलाशते रहे।
उजड़ा सही मगर हमें दयार तो मिला।

क्या हुआ जो हुस्न की दौलत न मिल सकी।
पर भाग्य से ये हुस्न का बाजार तो मिला।

सारे सुकूँ जला गयी किसी की दोस्ती।
फिर भी हमें ये फख्र है कोई यार तो मिला।

उनकी गली में कल मेरा मज़ार बन गया।
इस ज़िंदगी में ही कमल मज़ार तो मिला।

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बहुत ही खुब!! :+1:t2:

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Wah Kya likha hai !!

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:clap::clap::clap:

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